अगर 'भिस्म्म पितमह' ने समय पर बोला होता
युधिष्ठिर ने मायावी 'पासो' को तोला होता,,
शकुनि भी अगर थोडा 'भोला' होता
तोभगवान ने 'गीता' ना बोला होता..
यदि दुर्योधन के मन में 'पाप' ना होता
भरी सभा में 'कृष्ण' का यों अपमान न होता,,
द्रौपदि का वो ' रक्त स्नान ' ना होता
अगर उसकी 'स्मिता' पर दुश शासन का हाथ ना होता..
'धर्म' को सबने अपनाया जो होता
अपना शिशु 'पराया' ना होता,,
गुरु ने 'मोह' त्यगा धर्म अपनाया जो होता
एक 'बान्सुरि' बजाने वाले ने महाभारत कराया ना होता..
'लोभी' के सिर ताज जो सजाया ना होता
भविष्य के लिए 'वर्तमान' को हराया ना होता,,
'सोचती ह'ूं वक्त ने कभी ये इतिहास बनाया ना होता
अगर पुरुष ने ''अपनी आबरु को दाव पर लगाया ही ना होता''..
युधिष्ठिर ने मायावी 'पासो' को तोला होता,,
शकुनि भी अगर थोडा 'भोला' होता
तोभगवान ने 'गीता' ना बोला होता..
यदि दुर्योधन के मन में 'पाप' ना होता
भरी सभा में 'कृष्ण' का यों अपमान न होता,,
द्रौपदि का वो ' रक्त स्नान ' ना होता
अगर उसकी 'स्मिता' पर दुश शासन का हाथ ना होता..
'धर्म' को सबने अपनाया जो होता
अपना शिशु 'पराया' ना होता,,
गुरु ने 'मोह' त्यगा धर्म अपनाया जो होता
एक 'बान्सुरि' बजाने वाले ने महाभारत कराया ना होता..
'लोभी' के सिर ताज जो सजाया ना होता
भविष्य के लिए 'वर्तमान' को हराया ना होता,,
'सोचती ह'ूं वक्त ने कभी ये इतिहास बनाया ना होता
अगर पुरुष ने ''अपनी आबरु को दाव पर लगाया ही ना होता''..